वर्षा ऋतू

सावन में जब तू आती है…

 

सावन में जब तू आती है

घनघोर घटाएं छाती हैं

कभी पेड़ो को सहलाती है

कभी भंवरों के संग आती है

बागों में खेलती रहती है

छांव में बैठी रहती है

ना दुख में कभी तू रोती है

बस हंसती हंसती रहती है

न जाने कहां से आती है

ना जाने कहां खो जाती है

घटाओं को जरा तोड़-मरोड़

हवाओं से जरा लड़ झगड़

झीलों को भर भर के

नदियों को कल-कल करके

तू अपने घर को जाती है

तु अपने घर को जाती है

सावन में जब तू आती है

घनघोर घटाएं जाती है….

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